Home News भारत बना बड़ा बाजार, गूगल ने अलेक्सा को भी सिखाई हिंदी: डॉ. स्मिता मिश्र

भारत बना बड़ा बाजार, गूगल ने अलेक्सा को भी सिखाई हिंदी: डॉ. स्मिता मिश्र

नई दिल्ली

डिजिटल क्रांति का युग चल रहा है, वर्तमान समय में हर सुविधा और सेवा केवल एक क्लिक या टच पर उपलब्ध है। इस डिजिटलीकरण से हिन्दी भी अछूती नहीं रही है। अब तो गूगल भी हिंदी में बोलता है। डिजिटली हिन्दी में काम करना बहुत समय तक मुश्किल था लेकिन स्थिति ने नई करवट ली है अब फेसबुक हो या गूगल वह हिन्दी में सामग्री उपलब्ध कराने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। धीरे-धीरे हर चीज के डिजिटल हो जाने कारण जहां एक ओर बहुत सकारात्मक असर देखने को मिला है वहीं बहुत सारी चुनौतियां भी खड़ी हो गई है। इन चुनौतियों पर और इससे जुड़े अन्य विषयों पर चर्चा करने के लिए उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान लखनऊ, श्री गुरू तेग बहादुर खालसा कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय और डिजिटल पेमेंट कंपनी ई-पे के संयुक्त तत्वाधान में डिजिटल क्रांति और हिन्दी विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई।

 

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन माइक्रोसॉफ्ट के लोकलाइजेशन एंड एक्सेसबिलिटी के निदेशक बालेंदु दाधीच ने भूमिका रखी। बालेंदु दाधीच ने कहा कि अब भारतीय भाषाओं को केवल पश्चिमी देशों की प्रोद्योगिकी के उपभोक्ता बनकर ही नहीं रहना है बल्कि अब तकनीक प्रदाता के रूप में भी कार्य करना होगा, तभी भारतीय भाषाओं का और भारत का विकास होगा। थावे विद्यापीठ, बिहार के कुलाधिपति प्रो. केएन तिवारी ने नई प्रोद्योगिकी से उपजे प्रश्नों पर चिंता जताते हुए कहा कि अब चिंतन एवं विचार के लिए समय कम बच रहा है।

 

श्री गुरू तेगबहादुर खालसा कॉलेज प्रबंध समिति के अध्यक्ष सरदार तरलोचन सिंह ने हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं के विकास की बात को उठाते हुए कहा कि सभी भारतीय भाषाओं का साथ विकास होना चाहिए, उन्हें आपस में ही विरोध नहीं करना चाहिए। श्री गुरू तेगबहादुर खालसा कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राचार्य डॉ. जसविंदर सिंह ने ‘स्वयं’ पोर्टल का जिक्र करते हुए इ-लर्निंग के महत्त्व को बताया।

 


संगोष्ठी संयोजिका की डॉ. स्मिता मिश्र ने कहा कि जहां पहले हिंदी एवं भारतीय भाषा को कम्प्यूटर पर काम करने के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी पर अब भारत के बड़े बाज़ार के मद्देनजर गूगल अलेक्सा को भी हिंदी बोलनी पड़ रही है।

 

 

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. कुमुद शर्मा ने कहा कि सोशल मीडिया और विचार की उर्वरता बनाये रखने के लिए सोशल मीडिया के लिए विशेष प्रकार के उपवास की जरूरत है। उन्होंने कहा सोशल मीडिया में भाषा के लिए कोई नियम कायदा नहीं हैं। इस कारण कई प्रकार की समस्याएं भी आ रही हैं। अभिव्यक्ति यंत्र की कैद में आ गई हैं। उसका नियंत्रण किसी और के हाथ में हैं।

 

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के डीन एवं अध्यक्ष प्रो. अरुण भगत ने कहा की सोशल मीडिया हमारी ताकत हो सकती हैं। जिसके लिए हमें इंटरनेट पर हिंदी में शुद्ध जानकारी पहुंचाना आवश्यक है। अधिवक्ता एवं सोशल मीडिया एक्टिविस्ट प्रशांत उमराव ने लाइक, व्यू और फॉरवर्ड के लिए अपनी बौद्धिकता का प्रयोग करने की सलाह दी। इस माध्यम की ताकत पहचान कर उससे जुड़े कानूनों की भी जानकारी रखने की बात कही।

 

संगोष्ठी के दूसरे दिन एनडीटीवी के कार्यकारी सम्पादक प्रियदर्शन ने कहा कि हर शब्द के गहरे अर्थ होते हैं इसलिए शब्दों का सही प्रयोग आवश्यक है। भाषा अनुभव से विपन्न होती जा रही है, इसलिए भाषा में अनुभव का होना आवश्यक है। भाषा बदल रही है एक वक्त पर हम नहीं जानते थे सेल्फी क्या है पर आज का बच्चा भी जानता है सेल्फी क्या है। प्रसिद्ध सिने विश्लेषक एवं इकनोमिक टाइम्स में भाषा प्रभारी दिनेश श्रीनेत ने कहा कि कूल और गांधीगिरी जैसे शब्द पहले नहीं थे जो अब भाषा का अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं। डिजिटल माध्यम दूर होते हुए भी दो तरफा संवाद है। जो लेखक और पाठक को जोड़ने का काम करता है। पिछले कुछ वर्षों में इंटरनेट पर महिला लेखिकाओं की संख्या बढ़ी है जो डिजिटल क्रान्ति की ही देन हैं।

 

 

अमर उजाला डॉट कॉम के सम्पादक जयदीप कार्णिक ने कहा इंटरनेट ने सूचना और ज्ञान को जोड़ने का काम किया है। उन्होंने कहा कि भाषिक प्रयोग यदि बाजार से न आकर व्यक्ति विशेष के भीतर से उपजे तो भाषा का स्तर उत्तम होता है। उन्होंने बताया हिंदी के बाद इंटरनेट पर तमिल दूसरी भाषा है और मराठी तीसरी जिसमें अधिक कंटेंट लिखा जा रहा है। आजतक के न्यूज एंकर सईद अंसारी ने कहा कि गुरु नानक देव जी का ‘एक ओंकार’ और 'नाम जपना' सबसे बेहतर शिक्षाएं हैं। युवाओं को परेशान होने की जरूरत नहीं है डिजिटल प्लेटफार्म से भी नौकरियां प्राप्त की जा सकती हैं। उन्होंने बताया कि पत्रकार को सच्चाई से रूबरू कराने वाला होना चाहिए।

 

प्रसिद्ध रंग-कर्मी रवि तनेजा ने कहा बाबा नानक केविचारों की आज सबसे ज्यादा जरूरत है, क्योंकि वे कहते हैं सबका भला हो। वे अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि हम तकनीक के गुलाम तो हैं पर डिजिटल क्रान्ति ने हमें निर्भय भी बनाया है। बाबा साहब मध्यकाल के बुद्ध थे। सिनेमा और डिजिटल दौर के संदर्भ में बात करते हुए शिवकेश मिश्र ने कहा डिजिटल दौर ने सिनेमा में खलबली मचा दी है। साथ ही साथ इसने सिनेमा और लोगों के बीच एक गहरी खाईं को पाट दिया है और सिनेमा को आसान बनाया है।

 

इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के मीडिया प्रो. डॉ. सर्वेशदत्त त्रिपाठी ने बताया डिजिटलाइजेशन किसी भी माध्यम के लिए खतरा नहीं है। बल्कि यह उसे तकनीकी रूप से समृद्ध कर रहा है। डिजिटल दौर का सिनेमा बिना हिन्दी को अपनाए समृद्ध नहीं हो सकता क्योंकि हिन्दी का बाजार सबसे बड़ा है। न्यूज 18 डिजिटल के सम्पादक दयाशंकर मिश्र ने कहा कि क्लासिक सिनेमा में भी अभद्रताएं थीं नायिका को लुभाने के लिए नायक द्वारा उसे छेड़ा जाना आवश्यक था। नया सिनेमा ज्यादा बोल्ड है, उसमें पारंपरिक फिल्टर कमजोर हो गए हैं। उन्होंने बताया कि डिजिटल दौर के आने से सिनेमा बनाने वालों को आपकी रुचि का पता है क्योंकि इसमें हमारा डेटा समाहित होता है। वर्तमान समाज बदल रहा है इस लिए सिनमा को भी बदलना तो होगा ही। बदलते दौर में सिनेमा की नई बुलंदियों को छूने में डिजिटल दौर कारगर होगा।

 

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के उप-कुलपति प्रो. सत्यकाम ने कहा कि शिक्षा में डिजिटल क्रांति से आए सकारात्मक बदलावों की चर्चा करते हुए कहा कि इग्नू में प्रत्येक वर्ष लगभग दो लाख विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं। इतनी बड़ी संख्या को कंटेंट एवं अन्य सूचना उपलब्ध करना डिजिटल तकनीक के माध्यम से संभव हो पाया। प्रो. संजीव भानावत ने इस आशंका से इनकार किया कि ई-लर्निंग के दौर में शिक्षक का महत्त्व समाप्त हो जायेगा।
 

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