Home Others अयोध्या फैसले के 5 जज: किसी ने बदला था पिता का फैसला तो कोई तीन तलाक पर नहीं था बाकियों के साथ

अयोध्या फैसले के 5 जज: किसी ने बदला था पिता का फैसला तो कोई तीन तलाक पर नहीं था बाकियों के साथ

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लखनऊ/ नई दिल्ली

 

सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाया जा चुका है। शताब्दियों से चले आ रहे इस मामले की अंतिम सुनवाई 40 दिनों में पूरी हुई थी, जिसमें हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों की ओर से तीखी बहस की गई थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले को सुना और 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला देने के साथ में यह भी आदेश दिया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ जमीन दी जाए। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह मंदिर निर्माण के लिए 3 महीने में ट्रस्ट बनाए। इस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी प्रतिनिधित्व देने को कहा है। राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने सर्वसम्मति यानी 5-0 से ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हम आपको बता रहे हैं यह फैसला देने वाले 5 जजों के बारे में खास बातें:

 

जस्टिस रंजन गोगोई
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया यानी सीजेआई रंजन गोगोई असम के रहने वाले हैं। 18 नवंबर, 1954 को जन्मे जस्टिस रंजन गोगोई ने 1978 में बार काउंसिल ज्वाइन की थी। उन्होंने शुरुआत गुवाहाटी हाई कोर्ट से की, 2001 में गुवाहाटी हाई कोर्ट में जज भी बने। इसके बाद वह पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में बतौर जज 2010 में नियुक्त हुए, 2011 में वह पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 23 अप्रैल, 2012 को जस्टिस रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वह अगले हफ्ते 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं। गोगोई कई अहम फैसले दे चुके हैं। इनमें असम में एनआरसी लागू करने का आदेश, सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की तस्वीरें छापने पर रोक, पवित्र धार्मिक पुस्तकों जैसे रामायण के नाम पर सेवा या सामान के ट्रेडमार्क का दावा न किए जाने जैसे बहुचर्चित फैसले शामिल हैं।

 

जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े (एस.ए. बोबड़े)
जस्टिस शरद अरविंद (एसए) बोबडे 17 नवंबर को जस्टिस गोगोई के रिटायर होने के बाद देश के 47वें मुख्य न्यायाधीश का पदभार सभांलेंगे। वह सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता के क्रम में दूसरे नंबर पर हैं। जस्टिस बोबडे 12 अप्रैल 2013 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे। 1978 में वह बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र में शामिल हुए थे। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में लॉ की प्रैक्टिस की। साल 2000 में उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में बतौर एडिशनल जज पदभार ग्रहण किया। इसके बाद वह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने और 2013 में सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज कमान संभाली। जस्टिस बोबड़े ने अयोध्या जमीन मामले के अलावा आधार, निजता का अधिकार, आर्थिक रूप से पिछले लोगों के लिए आरक्षण और अनुच्छेद 370 जैसे कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की है। जस्टिस एसए बोबडे चीफ जस्टिस का पदभार संभालने के बाद 23 अप्रैल, 2021 को रिटायर होंगे।

 

जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने 13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट के जज का पदभार संभाला था। उनके पिता जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट का जज बनने से पहले जस्टिस चंद्रचूड़ इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। वह केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक ठहराने, निजता को मौलिक अधिकार घोषित करने, दो बालिगों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने, आईपीसी की धारा 497 को समानता के हक का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक घोषित करने और इच्छामृत्यु के अधिकार जैसे फैसले दे चुके हैं। न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ के ऐतिहासिक फ़ैसलों में से एक वो है जिसमें उन्होंने अपने पिता के 1985 के आदेश को बदल दिया था। डीवाई चंद्रचूड़ के पिता ने अपने फ़ैसले में व्यभिचार क़ानून (एडल्ट्री) (धारा 497) को संवैधानिक रूप से वैध बताया था। लेकिन, उन्होंने अपने फ़ैसले में कहा कि धारा 497 वास्तव में महिलाओं के सम्मान और स्वाभिमान को आहत करती है। उन्होंने कहा था कि महिलाओं को उनके पति की संपत्ति नहीं माना जा सकता और यह क़ानून उनकी सेक्सुअल आज़ादी का हनन करता है।

 

जस्टिस अशोक भूषण
यूपी के जौनपुर के रहने वाले जस्टिस अशोक भूषण सुप्रीम कोर्ट में जज बनने से पहले केरल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। वह साल 1979 में यूपी बार काउंसिल का हिस्सा बने, जिसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस की। इसके अलावा उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में कई पदों पर काम किया और 2001 में बतौर जज नियुक्त हुए। 2014 में वह केरल हाई कोर्ट के जज नियुक्त हुए और 2015 में चीफ जस्टिस बने। 13 मई 2016 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में कार्यभार संभाला। जस्टिस भूषण के बड़े फैसलों पर गौर करें तो इनमें इच्छामृत्यु का अधिकार, दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों पर दिया फैसला शामिल है। वह आधार कानून की संवैधानिकता परखने वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में भी रहे। अयोध्या पर इस्माइल फारूकी केस में मस्जिद को इस्लाम का अभिन्न हिस्सा न मानने वाली टिप्पणी पर दाखिल पुनर्विचार की मांग को खारिज करने का फैसला भी उन्होंने दिया था। केरल हाई कोर्ट में रहते हुए उनकी बेंच ने आदेश दिया था कि पुलिस को सूचना के अधिकार क़ानून के तहत एफ़आईआर की कॉपी उपलब्ध करानी होगी।

 

जस्टिस एस अब्दुल नजीर
न्यायाधीश अब्दुल नज़ीर फ़रवरी 2017 को कर्नाटक हाई कोर्ट से प्रमोट होकर सुप्रीम कोर्ट में आए, वह जनवरी 2023 तक यहां बने रहेंगे। इससे पहले वह किसी भी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नहीं रहे हैं। मंगलौर से आने वाले न्यायाधीश अब्दुल नज़ीर ने कर्नाटक हाई कोर्ट में क़रीब 20 सालों तक बतौर अधिवक्ता काम किया है और उन्हें 2003 में हाई कोर्ट का अतिरिक्त न्यायधीश नियुक्त किया गया था। उनके बहुचर्चित फैसलों में तीन तलाक के मामले में अल्पमत का फैसला था। उन्होंने तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित नहीं किया था, जबकि पांच सदस्यीय संविधान पीठ के तीन जजों ने बहुमत से फैसला देते हुए तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया था।

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