Home Interview डिग्री नहीं... स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान दें स्टूडेंट्स: प्रो. पियूष कांत दीक्षित

डिग्री नहीं... स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान दें स्टूडेंट्स: प्रो. पियूष कांत दीक्षित

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नई दिल्ली/लखनऊ

संस्कृत भाषा संसार की समस्त परिष्कृत भाषाओं में प्राचीनतम है। संस्कृत भाषा संसार भर की समस्त भाषाओं में वैदिक तथा अन्य महान साहित्य के कारण श्रेष्ठ है। इसको धार्मिक दृष्टि से 'देववाणी' या 'सुर-भारती' भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म के सभी शास्त्र इसी भाषा में निबद्ध हैं और उनका उद्भव ऋषियों एवं देवताओं से माना जाता है। अत: उनसे सम्बद्ध होने के कारण यह देववाणी कहलाती है। उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. पियूष कान्त दीक्षित कहते हैं कि देवताओं का आह्वान करने के लिये मन्त्र आदि का निर्माण संस्कृत भाषा में ही हुआ है। इन मन्त्रों में अपार शक्ति है, और भी देवता इसी भाषा को समझते और बोलते हैं।

 

 

संस्कृत भाषा में सभी भाषाएं समाहित हैं: प्रो. दीक्षित

प्रो. दीक्षित कहते है कि संस्कृत देवभाषा है। यह अमरभाषा सभी भाषाओं की जननी है। इसी भाषा में विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद उपलब्ध है। विश्व के लिये उपादेय समस्त विज्ञान, सदाचार, दर्शन, इतिहास आदि से समृद्ध अट्ठारह विद्याएँ इसी भाषा में निबद्ध हैं। संस्कृत ही सरस्वती का मूर्त स्वरूप है।

 

समाज में शिक्षित युवाओं की स्थिति चिन्तनीय: प्रो. पियूषकान्त 

प्रो. पियूषकान्त कहते है कि समाज में शिक्षा का स्तर साक्षरता की दृष्टि से समृद्ध अवश्य हुआ है, पर गुणवत्ता, मानवीय सद्भावना के स्तर पर शिक्षा निरन्तर अधोगति की ओर अग्रसर है। शिक्षित युवाओं की दिशाहीनता की स्थिति चिन्तनीय है। ऐसा प्रतीत होता है “साक्षरा विपरीताश्चेत् राक्षसा एव केवलम्” यह उक्ति चरितार्थ हो रही है।

 

सामाजिक जीवन में शिक्षा की महत्व जानें: प्रो. दीक्षित

प्रो. दीक्षित कहते है कि सामाजिक जीवन में शिक्षा मानव को विनम्र बनाती है। विनम्रता वह जीवन का सोपान है जिस पर आरूढ़ हो कर ही हम सत्पात्र बनते हैं। पात्र में प्राप्त धन ही धर्म का कारण माना जाता है। इस वैज्ञानिक क्रम से ही धर्मशील मानव विविध सुखों का वास्तविक अधिकारी हो पाता है। मानव जीवन में यही शिक्षा की उपयोगिता है जो भारतीय भलीभाँति जानते हैं। ज्ञान की चोरी सम्भव नहीं। ... ज्ञान सभी प्रकार की समृद्धियों में श्रेष्ठ है। पाँच वकारों में विद्या या शिक्षा प्रथम स्थान रखती है। यह भी शिक्षा की उपयोगिता की ओर ही इङ्गित करता है।

 

शिक्षा को मात्र धन का साधन न मानें: प्रो. पियूषकान्त 

प्रो. पियूषकान्त कहते है कि वर्तमान समय में युवाओं की सोच शिक्षा एवं शिक्षकों के प्रति नितान्त उपेक्षा पूर्ण है। आज का युवा शिक्षा में अपेक्षित समय न देकर त्वरित गति से शिक्षित हो कर सफलता के हर पड़ाव को किसी भी तरह प्राप्त करना चाहता है। यही कारण है कि मानव जीवन की नींव शिक्षा परिपक्व न होने से आज का युवा वास्तविक सुख से कोसों दूर ही है। इसका मूल कारण शिक्षा को मात्र धन का साधन मानने की दृष्टि है। एजुकेशन बीट्स से बातचीत में उन्होंने बताया कि आज शिक्षा का मानवनिर्माण के बिना मात्र मशीनीकरण हो गया है। इस प्रक्रिया में मानव मशीन बनाते बनाते स्वयं मशीन सा बन गया है। यह वास्तविक विकास के सन्दर्भ में नितांत चिन्ता का विषय है। देखिए पूरा साक्षात्कार...

 

 

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