Home Interview इंटरव्यू: नम्बर नहीं, बच्चों के टैलेंट पर फोकस करें अभिभावक- छाया शुक्ला 

इंटरव्यू: नम्बर नहीं, बच्चों के टैलेंट पर फोकस करें अभिभावक- छाया शुक्ला 

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आप सभी जानते हैं कि आज के समय में शिक्षा का सबसे अधिक महत्व है क्योंकि शिक्षित होकर ही हम समाज को जान पाते हैं, समाजिक व्यवस्थाओं को समझ पाते हैं, जीवन जीने की कला सीख पाते हैं। लेकिन कभी-कभी अव्यवस्थाओं के चलते हमारा सामना कुछ ऐसी स्थितियों से हो जाता है जिनके कारण हम चाह कर भी आगे नहीं बढ़ पाते, अनेकों प्रयास करने के बाद भी हम ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते। यहां तक हम अपनी उन प्रतिभाओं को भी नष्ट कर देते हैं, जो हमारे जीवन के एक आधार के रूप में कार्य करती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बाल्यावस्था से युवावस्था तक आने वाली ऐसी अनेकों समस्याओं से लड़ने के समाज, परिवार और छात्रों को प्रेरणा देने वाली उत्तर प्रदेश राजकीय शिक्षक संघ की प्रांतीय महामंत्री श्रीमती छाया शुक्ला जी के साथ एजुकेशन बीट्स की रेजिडेंट एडिटर दिव्या गौरव त्रिपाठी और रिपोर्टर पूर्ति सिंह की हुई खास बातचीत के कुछ अंश-

 

 

1. आप उत्तर प्रदेश के राजकीय शिक्षक संघ की प्रान्तीय महामंत्री हैं तो सबसे पहले आप अपने संगठन के विषय में कुछ बताएं?

प्रदेश में पोस्टेड शिक्षकों की संख्या केवल 5000 हैं और 1700 की पोस्ट अभी खाली पड़ी है तो इनमें से हर शिक्षक अपनी समस्याओं लेकर ऊपर तक नहीं पहुंच सकता, इसके लिए एक अच्छे संगठन की आवश्यकता होती है। हम अपनी समस्याओं के हल के लिए समस्या से संबंधित अधिकारियों और शासन से बातचीत करते है, जिससे कि विभाग को अच्छी तरह से व्यवस्थित कर सकें। इसके लिए एक संगठन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार हमारा संगठन भी काम कर रहा है।

 

 

2. आप एक संगठन की महामंत्री हैं तो इस नाते छात्रहित के लिए किस तरह से काम करती हैं?

छात्रहित जैसे विषयों को लेकर अभी कुछ दिन पहले हमारी मीटिंग डायरेक्टर साहब से हुई थी। शिक्षा से संबंधित जो भी नीतियां सरकार चलाती है, उन पर कार्यक्रम करती है, यह बहुत अच्छी बात है और कार्यक्रमों के माध्यम से ये नीतियां सफल भी हो रही हैं लेकिन ऐसे सरकारी नीतियों वाले कार्यक्रमों पर बच्चों की भागीदारी होना यह अच्छी बात नहीं है। मेरा मानना है कि कार्यक्रम किसी भी विभाग का हो लेकिन उसके लिए बच्चों के द्वारा रैलियां निकलवाना, बच्चों के द्वारा प्रोग्राम्स कराना, यह सब ठीक नहीं होता है। कुछ समय पहले ही एक आदेश आया था कि विद्यालय में चलने वाली अंतिम दो बेला(पीरियड) में बच्चों से विद्यालय की सफाई कराई जाए साथ ही उसकी फोटो खींचकर विभाग को भेजी जाएं। एक पीरियड 40 मिनट का होता है, इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितना समय इससे बर्बाद होगा। इतना समय अगर पढ़ाई में लगता तो कितना अच्छा होता। समस्या तो सबसे बड़ी यही है कि एक तरफ सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या कम होने से छात्र संख्या भी कम हो रही है। दूसरी तरफ जहां मुठ्ठी भर शिक्षक और छात्र बचे हैं, वहाँ भी शासन के अधिकारी शिक्षकों को दुनिया भर के काम में लगाए रहते हैं और जो समय बचता है उसमें सरकार बच्चों और शिक्षकों से रैलियां निकलवाती है। मेरा सवाल यह है कि क्या आज सरकारी टीचर्स और बच्चे केवल राजनैतिक कार्यक्रमों में भीड़ बढ़ाने के लिए रह गए हैं? ये बहुत बड़ा मुद्दा है कम से कम राजनैतिक चीजों से बच्चों को दूर रखना चाहिए। सरकार से मैं यही कहना चाहूंगी कि अपने कार्यक्रमों के चलते बच्चों का समय नष्ट न करे क्योंकि बच्चे यहां अपना भविष्य बनाने के लिए आए हैं, न कि आपकी भीड़ बढ़ाने और साफ-सफाई के करने। हम इस बात को भी मानते हैं कि बच्चों की आदत साफ-सफाई की होनी चाहिए लेकिन इसे भी सिर्फ वहीं तक होना चाहिए कि क्लास में बैठे हैं तो कागज फाड़कर इधर-उधर न फेकें, पेंसिल छीलकर उसका कूड़ा यहां-वहां न डालें, कुछ खाकर उसके रैपर्स कक्षा में न डालें आदि। बाकी सरकार यदि बच्चों को राजनीतिक कार्यक्रमों से दूर रखे तो हमें भी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए छात्रहित में काम करने का मौका मिलेगा।

 

 

3. शिक्षक के तौर पर आप बच्चों से क्या अपेक्षाएं रखती हैं?

एक शिक्षक के तौर पर मैं अपने छात्रों से इतनी अपेक्षा रखती हूं कि क्लास में रेग्यूलर रहें और खुद को इतना मजबूत बना लें कि जरा सा बुखार आने पर घर पर न बैठ जाएं। शिक्षकों से बच्चों की इतनी दूरी नहीं होनी चाहिए कि वह अपनी बात भी न कह सकें। हां, शिक्षक को भी इतना आना चाहिए कि बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार कर के उनके मन की बात जान सकें या बच्चे आकर निःसंकोच उनसे बात कर सकें। ज्यादातर देखा गया है कि बच्चे अपने शिक्षक से इतना ज्यादा डरते हैं कि यदि कोई समस्या भी आ जाती है तो वे शिक्षक से कह नहीं पाते हैं। लेकिन मुझे खुशी है कि मेरे बच्चे मुझसे हर बात शेयर करते हैं। मैं बच्चों के लिए सब कुछ करने को तैयार रहती हूं, क्योंकि कुछ बच्चे बहुत गरीब परिवार से आते हैं और महंगी पुस्तकें नहीं खरीद सकते। मेरे माध्यम से जितनी सुविधा उन्हें मिल सकती है, वे सभी सुविधाएं मैं उन्हें देती हूं।

 

 

4. छात्रों के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए अभिभावकों को क्या करना चाहिए? 

सबसे जरूरी है कि अभिभावकों को रोज स्कूल नहीं जाना चाहिए लेकिन अभिभावकों को शिक्षकों से फोन के माध्यम से सम्पर्क में अवश्य रहना चाहिए। हमारे कॉलेज में ऐसे अभिभावक आते है जो सिर्फ बच्चे का एडमिशन कराने आते हैं, उसके बाद उनका कोई अता-पता नहीं होता। ऐसी स्थिति में मुझे खुद फोन करके बताना पड़ता है कि आप का बच्चा नहीं आ रहा या उसकी फीस नहीं आ रही है। सच कहूं तो पढ़ने में कमजोर बच्चा भी अगर रोजाना स्कूल आए और टीचर भी गंभीरता से पढ़ाए तो बच्चा होशियार हो ही जाएगा। लेकिन यह काम भी वही टीचर कर सकते हैं जो पढ़े-लिखे होते हैं, मेरिट से आते हैं।

 

 

5. आप साइंस की टीचर हैं, ऐसा कहा जाता है कि साइंस का स्लेबस कॉम्पटिशन लेवल पर हिन्दी में उपलब्ध नहीं रहता, क्या आपको नहीं लगता कि हिन्दी मातृ भाषा होने के नाते सेलेबस भी हिन्दी में होना चाहिए?

हमारे यहां साइंस का सेलेबस हिन्दी में ही है। साइंस में जो शब्दावली है, वह बच्चों को और हमें इंग्लिश में ज्यादा अच्छे से समझ में आती है। हिन्दी के शब्द कठिन होते हैं लेकिन फिर भी कॉम्पटिशन लेवल पर हिन्दी में भी किताबें उपलब्ध होनी चाहिए।

 

 

 

 

6. यदि ये किताबें हिन्दी में उपलब्ध हो सकती हैं तो इसके लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं, क्या आप लोग अपने लेवल पर कोई ऐसा प्रयास कर रहे हैं?

देखिए, अपने स्तर से हम इतना ही कर रहे हैं कि कक्षाओं में शब्दावली इंग्लिश से लेकर वाक्यों को हिंदी में समझा कर पढ़ाते हैं। वैसे इसके लिए अगर हिंदी में किताबें भी पब्लिश होने लगें तो शायद हिन्दी मीडियम वाले बच्चों को पढ़ने में बहुत आसानी होगी।

 

 

7. आपको ऐसा नहीं लगता कि आज के समय में पढ़ाई को बहुत प्रेशर की तरह लिया जाने लगा है, जिसकी वजह से बच्चे आज अपनी क्रिएटिविटी को भूलते जा रहे हैं।

शिक्षक और अभिभावक दोनों का दायित्व है कि बच्चे के अंदर छिपी प्रतिभा को जानने का प्रयास करें और उसे वहीं भेजें, जिसमें उसकी रुचि है। मैं कहना चाहती हूं कि यदि शिक्षक चाहे तो बच्चे के गुणों को देखते हुए उसे बहुत आगे बढ़ा सकता है। वैसे हर अभिभावक इतना समझदार नहीं होता कि वह बच्चे को हर तरीके से देखे लेकिन अभिभावक को यह भी समझना पड़ेगा कि बच्चे में पढ़ाई के साथ और क्या टैलेंट है। एक और बात बच्चों के अभिभावकों के लिए है कि आप बच्चे के परसेंट पर मत जाओ कि कितने परसेंट आए हैं? या कुछ यूं कहें कि उसके नम्बरों की तुलना अन्य बच्चों के नम्बरों से नहीं करनी चाहिए। इन्हीं सब कारणों के चलते आज के बच्चे सुसाइड तक कर लेते हैं। इसका एक कारण अभिभावकों का बच्चों की पढ़ाई को लेकर प्रेशर ही है जो कि नहीं होना चाहिए। अभिभावक का सही काम है कि बच्चे को समय-समय पर समझाते रहें और उसका ध्यान रखें।

 

 

8. आज के समय में देखा जा रहा है कि साइंस साइड के बच्चों को होशियार माना जाता है तो अन्य साइड्स के बच्चों को कमतर आंका जाता है, ऐसा क्यों?

जी, ये सच है कि अन्य साइड वाले बच्चों को थोड़ा हीन दृष्टि से देखा जाता है। ये आज की बात नहीं बल्कि बहुत समय से है क्योंकि 1975 में मैंने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की थी तो ये मैं उस समय से देखती चली आ रही हूं। उस समय में भी बच्चों और शिक्षकों में ऐसी भावना होती थी कि हम साइंस वाले हैं और सामने वाला दूरी साइड का है, हम अधिक महत्व रखते हैं और सामने वाला कोई महत्व नहीं रखता। सच कहूं तो आज भी यही चल रहा है लेकिन ये नहीं होना चाहिए। मैं भी साइंस की प्रोफेसर हूं और मुझसे हिन्दी की बात की जाए तो मैं हिन्दी में इतना अच्छा नहीं कर सकती। हिन्दी विषय को कायदे से देखा जाए तो यह बहुत ही कठिन है। यदि आज के समय में कोई शुद्ध हिन्दी बोलने लग जाए तो आज के बच्चे ढंग से एक वाक्य भी समझ नहीं पाएंगे। एक तरह से देखा जाए तो यह बहुत शर्म की बात है कि हिंदुस्तान में रहकर हम ढंग से हिंदी भी नहीं समझ पाते हैं। इसलिए कोई भी विषय हो, हीन दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।

 

 

9. आपके विचार से आज की शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव होने चाहिए?

एक नजरिए से देखा जाए तो आज की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो चुकी है। इस पर कई प्रयोग किए जा रहे हैं लेकिन सभी असफल भी हो रहे हैं। इसका कारण यह है कि शिक्षा पर कम और अन्य चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। हमारे तीन बोर्ड हैं, सीबीएसई, आईसीएसई और यूपी बोर्ड। इनमें से यूपी बोर्ड सबसे अच्छा माना जाता है लेकिन आज यूपी बोर्ड पूरी तरह से सीबीएसई बोर्ड के पैटर्न पर जा चुका है। मैं टीचिंग लाइन में आ चुकी थी, जिसके बाद साइंस विषय कक्षा 9 में अनिवार्य कर दिया गया जो कि नहीं होना चाहिए। जब हम पढ़ते थे उस वक्त साइंस, आर्ट्स और कॉमर्स के बच्चे अलग-अलग जाते थे। लेकिन अब वह नहीं है। जिस तरह के बदलाव आवश्यक हैं, वे बदलाव होने चाहिए।

 

 

10. जो लोग इंटरव्यू के आधार पर आपको पढ़ेंगे, उन बच्चों को क्या मैसेज देना चाहेंगी?

इतना ही कहना चाहूंगी कि अभी जिस उम्र में बच्चे हैं तो उनका मुख्य उद्देश्य पढ़ाई होना चाहिए। इसके अलावा उन्हें जिस भी विषय में रुचि है वह खुल कर अपने अभिभावकों को बताएं और उसी क्षेत्र में जाएं। इंटर के बाद बच्चों में अच्छे-बुरे की समझ आ ही जाती है। खुद को समाज की बुराइंयों से दूर रखते हुए अच्छे नागरिक बनने का प्रयास करना चाहिए। विद्यालय में या कहीं भी यदि कोई बुराई है तो उनसे वह सीख लें। बहुत से बच्चे गरीब होते हैं तो उन्हे भी सीखना चाहिए कि उन्हें अपने पिता से बहुत आगे निकलना है साथ ही उन्हें नशे जैसी चीजों से दूर भी रहना है।

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