Home Interview संस्कृत से लेकर वेदों तक... जानिए कितनी समृद्ध थी भारत की शिक्षा व्यवस्था

संस्कृत से लेकर वेदों तक... जानिए कितनी समृद्ध थी भारत की शिक्षा व्यवस्था

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हरिद्वार/लखनऊ

भारत की ज्ञान परंपरा और विचारधारा संस्कृत में ही निहित है। विविधता में एकता का विचार भारत में ही है और इसका प्रकटीकरण संस्कृत में है। यह बात उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी ने कही। उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज में व्याप्त विरूपता का सबसे बड़ा कारण भारतीय संस्कृति को छोड़ना है। विभिन्न राज्यों के बीच सांस्कृतिक एकता संस्कृत के कारण ही है। संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी वेदों की भाषा है। इसलिए  इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं भी संशय की संभावना नहीं है। संस्कृत कई भारतीय भाषाओं की जननी है। इन भाषाओं की अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है। पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक एकरूपता आयेगी जिससे भारतीय एकता बलवती होगी। हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में हैं, इसी के साथ हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है। 

 

प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा सदियों पुरानी है। एक समय वह भी था जब शिक्षा के शीर्ष 10 विश्वविद्यालय भारत में ही हुआ करते थे। नालंदा, तक्षशिला कुंडिनपुर, श्रीवल्लभी आदि शिक्षा के बड़े केन्द्र हुआ करते थे। श्रीवल्लभी में महिला शिक्षा का केन्द्र था, जबकि कुंडिनपुर शारीरिक शिक्षा का। दूर देशों के लोग भी भारत में संस्कृत सीखने के लिए आते थे।

 

प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि सामाजिक समरसता, छुआछूत निवारण और राष्ट्रीय भावना जागृत करने के लिए संस्कृत आवश्यक है। आज विद्यालयों में नैतिक शिक्षा नहीं दी जाती, घरों में भी संस्कार नहीं मिल रहे हैं। मोबाइल और टीवी की वजह से भी अनैतिकता बढ़ी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा में नैतिक शिक्षा और मूल्य आधारिक शिक्षा का समावेश अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। नैतिकता आज की आवश्यकता है और इसके लिए संस्कृत के अलावा कोई और मार्ग नहीं है। एजुकेशन बीट्स डॉट कॉम की रेजिडेंट एडिटर दिव्या गौरव त्रिपाठी ने प्रो. त्रिपाठी से कई महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत की। देखें पूरा इंटरव्यू...

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