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जब दर्द की काली रातों में, कई पर्तो में ऊलझन आए

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पूँछा है क्या तुमने,
शायद खुदसे पहले कभी।

 

तुम्हारे हार जाने से ठीक पहले,
तुम जीत के बेहद करीब हो।

 

मन को बुझने मत देना,
एकाकी नहीं तुम अपनेपन में।

 

दिया उम्मीद का थामें,
बढ़ते जाओ सफर में।

 

लड़ते जाओ कठिन डगर में,
धीर गंभीर कर्मरथी सारथी सा।

 

चलते जाओ बढ़ते जाओ रुको नहीं,
डटे रहो रमे रहो डरो नहीं।

 

जब दर्द की काली रातों में,
कई पर्तो में ऊलझन आए।

 

जब पलकों पे नींद चढ़ी हो,
बोझिल दिल से रहा न जाए।

 

रो लेना पर टूटना मत पत्थर सा,
तुम कर्मरथी हो रमे रहो डटे रहो।

 

ओम शिवम उपाध्याय 'मलंग'
प्रयागराज

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