Home Blogs हुआ है जो अपराध हमीं से, वो हरगिज ना माफी के लायक है

हुआ है जो अपराध हमीं से, वो हरगिज ना माफी के लायक है

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तासीर नहीं मिलती जब तुमसे,
तो हालातों को पढ़ लेता हूं।

 

मिलता है उसमें जो कुछ भी,
मैं उसे अल्फाजो में गढ़ लेता हूं। 

 

जो भी बीते पल संघर्षों के, 
मैं उन्हें स्मरण कर लेता हूं। 

 

मेरा तुमसे यूं ही बिछड़ना,
सच में ही पीड़ा दायक है।

 

हुआ है जो अपराध हमीं से,
वो हरगिज ना माफी के लायक है।

 

कहा था तूने जो भी मुझसे,
मैं वो बातें सदा निभाऊंगा।

 

देता हूं मैं वचन तुझे यह,
कि मैं रस्ते में तेरे ना आऊंगा।

 

तुम रहो सलामत हरदम ही, 
मैं ये ही दुआ मनाऊंगा।

 

जिस रोज होऊंगा तनिक भी चिंतित,
मैं खुद अन्तर्मन में झांकूगा।

 

जानता हूं कि बिन तेरे रहना, 
सच में ही बहुत कठिन होगा।

 

जब भी आवेंगी तेरी यादें, 
इन नयनो में बस तू होगा।

 

दिया था मैंने जो स्थान तुम्हें,
उस पर सदा ही काबिज रखूंगा।

 

बेशक सांसों का आलम छूटे,
लेकिन तुझसे प्रीत ना छोडूंगा।


अनूप पाण्डेय
नई दिल्ली

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