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नभ जल वायु धरा के, भंडारों का भीषणतम दोहन जारी है

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प्रकृति तो गुण दोष रहित है,
यह मानव सृजित महामारी है।

 

नभ जल वायु धरा के,
भंडारों का भीषणतम दोहन जारी है

 

कराह उठी जब प्रकृति, 
उसने मानो प्रतिकार किया।

मानव सृजित दोहन के अहंकार,
को क्षणभंगुर पल भर में किया।

 

मानव ही है जब सृजनकर्ता,
इस भीषणतम वैश्विक महामारी का।

 

अब स्वयं मानव ही बन सकता ,
रक्षक इस वृहत वसुंधरा प्यारी का।

 

पुनः भागीरथ बनकर अब,
मानवता रूपी गंगा को प्रवाहमान करो।

 

हे पृथ्वी श्रेष्ठ संकल्पित होकर,
प्रकृति का उद्धार करो उद्धार करो।।

शशांक शेखर

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