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कविता: रही हो भीड़ चाहे जो, मगर मैं खुद ही का सहारा हूं

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आपको ही सोचते-सोचते वक्त निकल जाता है,
रहूं बेशक महफिलों में कितना मगर फिर भी मेरा।

 

ये दिल मुझे हरदम हरपल मायूस ही नजर आता है,
जानता हूं है जमाने में मुझे समझने वाला कोई भी नहीं।। 

 

फिर भी न जानें क्यों हर बार मेरा ये बेताब सा दिल,
खुद से ज्यादा जमाने पर बेहिसाब यकीन कर जाता है।

 

नहीं है रंज गम कोई मुझे न ही खुद से मैं हारा हूं,
रही हो भीड़ चाहें जो मगर मैं खुद ही का सहारा हूं॥ 

 

मिलेगा वक्त जो हमको तो हम तुमको बताएंगे,
सुलगती आग है दिल में वो हम तुमको दिखाएंगे।

 

न खुद से ही छुपाएंगे न तुम से ही छुपाएंगे,
जिगर का जो भी है मंजर वो तुमको ही दिखाएंगे॥ 

 

नहीं होता हूं मैं क्रोधित कोई जब अपशब्द कहता है, 
जानता हूं है जिगर ये तेरा इसमें बस तू ही रहता है।

 

मेरी सांसों में घुलकर ही तेरे एहसास आते हैं, 
तेरे दिल में है भला कोई ये वो मुझको बताते हैं॥ 

 

नहीं मुझसे छुपाते हैं न हीं वो मुझसे चुराते हैं, 
तेरी आँखों के दोनो पुतले मुझे हर राज दिखाते हैं।

 

भले हो भीड़ कितनी भी मगर मैं तुझको ही चाहूंगा,
तेरे हर एक छोटे से संकट पर सदा मैं जां लुटाऊंगा॥ 

 

जमाने का दौर हो कोई मैं सदा तुझको ही चाहूंगा। 
मैं तुझको ही चाहूंगा जिगर में तुझको ही बसाऊंगा॥

कवि-अनूप पाण्डेय 
नई दिल्ली

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