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कविता: गांव मर गया

वो सुबह की कोयल
अब आवाज़ नहीं देती
गाड़ी की पी - पी और सुरसुराहट
जगाती है मुझे
पारले जी बिस्कुट का स्वाद
मर गया
देखो, मेरा गांव मर गया।

 

वो बड़ी - सी थाली गुम गई
या वो अपनत्व गुम गया
एक थाली की जगह
चार कटोरे ने ले ली
साथ मिलकर खाना
बन्द हो गया
देखो, मेरा गांव मर गया।

 

वो छत से छत के रिश्ते
नहीं रहे
वो दूर की चाची, दादी भी नहीं रही
वो पगडंडियों में घूमना
बंद हो गया
देखो, मेरा गांव मर गया।

 

वो लालटेन की लौ
नहीं जल रही
वो चूल्हे का आंच बुझ गया
खाने से मिट्टी की स्वाद गुम गई
कुत्ते,सियार का आवाज़ गुम गया
देखो, मेरा गांव मर गया।

 

प्रिया सिंह
नोएडा, उत्तर प्रदेश

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