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कविता: शहर और गांव का अंतर

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बेशक मखमल में कितना भी बैठो, लेकिन सुकून घास पर आता है।
मन में होता इक भाव अनोखा, जो कहीं और भी ना आता है।।

 

शहरों की जीवन शैली ने, इंसा को मशीन बना डाला।
कैसा होता है इंसानी जीवन, गाँवो ने सिखला डाला।।

 

जब भी निकलूं खलिहानों में, वो शाम निराली होती है।
शहरों की चकाचौंध से अच्छी, गाँवो की हरियाली होती है।।

 

रह लें ए .सी. में कितना भी, सुकून खुली हवा में मिलता है।
शहरों के पॉल्यूशन से अक्सर, दम अपना अब घुटता है॥

 

तभी तो अब इंसा जीवन में, सब छोड़ छाड़ गाँवों में ही बसता है।

 

कवि- अनूप पाण्डेय
नई दिल्ली

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