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पीर हो भले ही नासूर  हो, लख्ते जिगर में न घाव चाहिए

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सिर्फ और सिर्फ दिखावा नही,
देश भक्ति और जज्बे ताव चाहिए।


स्मरण हो पल छिन दुश्मने चमन का,
रोप दे जो अंगद सा पांव चाहिए।


पीर हो भले ही नासूर  हो,
लख्ते जिगर में न घाव चाहिए।


हिल रहीं बुनियादी इमारतें भी,
खंडहरों को भी अब छावं चाहिए।


हो अमन जहां चैन से रहे वहां, 
समरसता से भरा हर गली,गावं चाहिए।


पपीहे की बोली, कोयल की रागिनी,
खिलखिलाती धूप छावं चाहिए।


डूबनी न अब किसी मझधार में,
सांप्रदायिक एकता की नाव चाहिए।


जुल्म से डरें सभी यथार्थ पर लिखें कवि,
अलग-अलग ढपली न गान चाहिए।


करन त्रिपाठी
हरदोई, उत्तर प्रदेश

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