Home Blogs तब ही जीवन सुगम होगा नीति के आदर्श पर, खुशियों की बरसात होगी मनुजता के फर्श पर

तब ही जीवन सुगम होगा नीति के आदर्श पर, खुशियों की बरसात होगी मनुजता के फर्श पर

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स्वर लहरियों की प्रेक्षाएं हो गई हैं बेअसर,
निज शून्यता संगीत लेकर खो गई है बेखबर। 

 

भाव निजता का गया है आज के सम्भाषणो से,
रूप की नगरी ये चलती सिर्फ तम आकर्षणों से। 

 

वाक्यपटुता से पराजित हो रहा है सत्य अब,
दीन दुखियों की वेदनाएं सुन रहा है कौन अब। 

 

देखकर अपराध को धृतराष्ट्र सारे मौन हैं,
आज के युग का नया ये दुशासन कौन है। 

 

द्रोपदियों की टेर अब गिरधारी सुनते कहां,
सोचकर हैरान माली सुमन अब चुनते कहां। 

 

विटप भी संकीर्ण सब छांव आएगी कहां से,
इस चमन की शोखियां वापस आएगी कहां से। 

 

प्यासी धरा विकलित हुई द्रग नीर से सिंचन करो,
हे जगत आशक्त मानव निष्काम तुम चिंतन करो। 

 

ऐसे प्रगति होगी नहीं इस सद्गुणी आवृत्ति की, 
संस्कारों से बुहारो धूल अपनी धूमिल प्रवृत्ति की। 

 

व्यर्थ की आशाएं भी जन्मती प्रतिकार को,
यूं ना तौलो चपलता से हर किए उपकार को। 

 

एक जीवन श्रेष्ठ जीवन बस यहीं स्मृति रहे,
भावनाओ का ज्वर सदा यश की स्वीकृति रहे। 

 

तब ही जीवन सुगम होगा नीति के आदर्श पर,
खुशियों की बरसात होगी मनुजता के फर्श पर। 

करन त्रिपाठी

हरदोई

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