Home Blogs अहिंसा तथा प्रेम ही हैं मानवता को रक्षित करने का विकल्प

अहिंसा तथा प्रेम ही हैं मानवता को रक्षित करने का विकल्प

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महात्मा गांधी विश्व में अहिंसक आंदोलनों के प्रथम प्रणेता थे। उन्होंने भारतवर्ष से पहले दक्षिण अफ्रीका में क्रांति की मशाल जलाई थी। वहाँ पर उन्होंने अपने अहिंसक आंदोलनों द्वारा सरकार को झुकाने में सफलता प्राप्त की थी। उन्हीं अहिंसात्मक तरीकों का उन्होंने भारतवर्ष में भी प्रयोग किया तथा उनको नाम दिया सत्याग्रह। सत्याग्रह अर्थात् सत्य के लिए आग्रह करना। 

 

महात्मा गांधी अहिंसा के सच्चे पुजारी थे। वो अपने नैतिक मूल्यों पर सदैव डटे रहे। वो हिंसा को भी अहिंसा, क्रोध को प्रेम तथा असत्य को सत्य से जीतने की बात कहते थे। उन्होंने कभी भी हिंसा के प्रतिकार में भी हिंसा को उचित नहीं कहा। वो अहिंसात्मक तरीके से बिना किसी को क्षति पहुंचाए अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के पक्षधर थे आज उनकी इस बात को अपनाना अति आवश्यक हो गया है। आज के समय में लोग आन्दोलनों में राष्ट्र की सम्पत्तियों को बहुत क्षति पहुंचाते हैं। इससे वो अपने ही देश का नुकसान करते हैं। उन सब को अहिंसात्मक तथा शांतिपूर्ण आन्दोलन द्वारा सरकार तक अपनी बात पहुंचानी चाहिए। कवि अभिजित त्रिपाठी की पंक्तियां हैं कि

 

"यदि हिंसा हम करेंगे तो फिर देश हमारा टूटेगा,
फिर से कोई बाहर वाला आकर हमको लूटेगा। 
हमें विखण्डन से अब अपना देश बचाना होगा,
शान्ति-अहिंसा का पूरे भारत को पाठ पढ़ाना होगा।। "

 

इसी प्रकार आज सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त जंग के आसार को कम करके। आतंकवाद को विनष्ट करके। विश्वशांति स्थापित करने के लिए महात्मा गांधी के विचार बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। अहिंसा तथा प्रेम के द्वारा ही मानवता को रक्षित किया जा सकता है। युद्ध के द्वारा तो सिर्फ विनाश ही सम्भव है विकास नहीं। आज विश्व में शान्ति केवल गाँधी दर्शन के द्वारा ही स्थापित की जा सकती है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को यह निर्णय लिया कि महात्मा गाँधी के जन्मदिवस 2 अक्टूबर को सम्पूर्ण विश्व में विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाएगा। कवि अभिजित त्रिपाठी ने लिखा है कि

 

"युद्ध यहां पर विश्व को केवल केवल क्षति पहुंचाएगा,
मानवता की रक्षा जग में केवल गाँधी दर्शन कर पाएगा।"

 

महात्मा गांधी स्वदेशी आंदोलन के भी प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपने देश में निर्मित वस्तुओं के प्रयोग पर जोर दिया। वो स्वयं चरखे से सूत कातते थे तथा उससे बना वस्त्र ही पहनते थे। उनके आह्वान पर सम्पूर्ण भारत में स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। हर जगह पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जाने लगी तथा स्वदेशी सामानों की दुकानें खुलने लगी थी। इससे अंग्रेजी सरकार की कमर टूट गई तथा उसे समझौते के लिए विवश होना पड़ा। यह बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। आज भी राष्ट्र में एक स्वदेशी आंदोलन की आवश्यकता है। हम आजकल साबुन, तेल, मोबाइल, कपड़े, मूर्तियां, गाडियां आदि सबकुछ थोड़े से कम पैसों के लालच में विदेशी कम्पनियों से खरीदते हैं तथा अपने देश की अर्थव्यवस्था को स्वयं ही कमजोर करते हैं। आज हम सभी को यह प्रण लेना चाहिए कि हम सिर्फ और सिर्फ स्वदेशी वस्तुओं का ही प्रयोग करेंगे तभी हमारे देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी तथा भारत एक विकसित राष्ट्र बनेगा। मैं कवि अभिजित त्रिपाठी की पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करती हूं कि

"तभी बनेगा देश ये अपना विकसित सुदृढ़ और महान,
हम सब जब इस्तेमाल करेंगे भारत में निर्मित सामान। "

नम्रता सिंह
शाहबरी,प्रतापगढ़

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