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कभी चलो ना राह कोई ऐसी,  जो सच्ची में पीड़ादायक हो

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जो बात नहीं कह सका कोई, 
वो बात लबों पर आ बैठी। 
आखिर ऐसा हुआ है क्या, 
जो तू खुद से ही शरमा बैठी॥ 

 

नहीं सोचता नहीं खोजता,
मैं खुद में ही खुशी ढूंढता हूँ। 
जब भी होता है खुद से मिलना, 
मैं कुछ पल को वहीं ठहरता हूँ॥ 

 

बेशक कोई कितना भी करोदे,
ना दिल का हाल बताता हूँ। 
मैं मंद मंद मुस्काता हूँ, 
मैं मंद मंद मुस्काता हूँ॥ 

 

जो चलते हैं जिस राह डगर, 
उनको वो डगर मुबारक हो।
कभी चलो ना राह कोई ऐसी, 
जो सच्ची में पीड़ादायक हो॥ 

 

दूजे को पीड़ा पहुँचाकर,
खुशी नहीं कभी मिलती है। 
जो देता है सम्मान सभी को,
उसके आगे ये दुनियाँ झुकती है॥

 

अनूप पाण्डेय
नई दिल्ली

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