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अंगुली थाम के चलना सीखा, जब भी कदमों ने ली अंगड़ाई

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स्वाभिमान,अभिमान,संस्कृति,संस्कार का पहरा है। 
जिनके कंधे पर सर रखकर, मेरा बचपन गुजरा है।। 

 

पग-पग पर हैं बने हौसला,
जब भी ये कदम थमे होंगे। 
मै पतंग कच्चे कागज की,
और पिताजी डोर बने होंगे।। 

 

आस, और विस्वास का बंधन, सर पे मेरे गहरा है। 
जिनके कंधे पर सर रखकर, मेरा बचपन गुजरा है।। 

 

अंगुली थाम के चलना सीखा,
जब भी कदमों ने ली अंगड़ाई। 
मुझको नभ की सैर कराकर,
ना जाने कितनी ठोकर खाई।। 

 

हासिल हर शोहरत पर मेरे, पापा जी का सहरा है। 
जिनके कंधे पर सर रखकर, मेरा बचपन गुजरा है।। 

 

मेरे सपनों को सच करने में,
जाने कितनी इच्छायें मारी है। 
इक मेरी पहचान बनाने हित,
कितनी जीती बाजी हारी हैं।। 

 

बने मुसीबत में सहारा,हर मंजर आँखों में ठहरा है। 
जिनके कंधे पर सर रखकर, मेरा बचपन गुजरा है।। 

 

मन्दिर मस्जिद भले ना जाओ,
मात पिता का दिल ना तोड़ो। 
जिसने सींचा है खून से अपने,
अब उनको वृद्धाश्रम ना छोड़ो।। 

 

पिता वृक्ष सम होते है,जिनसे मेरा परचम लहरा है। 
जिनके कंधे पर सर रखकर, मेरा बचपन गुजरा है।। 

 

करन त्रिपाठी
हरदोई

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