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दूजों का मैं पेज चुराकर, अपनी प्लेन बनाता था

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मिट्टी का मैं बना मोबाइल, खुद से ही बतियाता था,
सपने में ही सैनिक बनकर, मैं सरहद पर जाता था।
अपनी कर झूठी तारीफें, इज्जत खूब कमाता था,
बहन-भाइयों की चुगली कर, माँ से मैं डंटवाता था।।


खुद भी गलती करके, मैं उनपर आरोप लगाता था,
बहुत मज़ा तब आता था, बहुत मज़ा तब आता था।।
हमउम्र साथियों को अपने, उल्लू बहुत बनाता था,
दूजों का मैं पेज चुराकर, अपनी प्लेन बनाता था।।

 

जन्मदिवस पर जबरन, सबसे केक मैं खाता था,
लंचबॉक्स भी यारों का, चुरा के मैं खा जाता था।
घर से मिली मिठाई लेकिन, सबको साथ खिलाता था,
बहुत मज़ा तब आता था, बहुत मज़ा तब आता था।।

 

बचपन के मैं अल्हड़पन में, जी भरके मुस्काता था,
भूत-प्रेत की कथा सुना, बच्चों को खूब डराता था।
पापा से पा एक चवन्नी, जमींदार बन जाता था,
तालाब के गंदे पानी में, बारिश में खूब नहाता था।।

 

कच्ची मिट्टी, गोबर से, मैं अपने महल बनाता था,
बहुत मज़ा तब आता था, बहुत मज़ा तब आता था।
चरखी लेकर आसमान में, दिनभर पतंग उड़ाता था,
बारिश के पानी में अपनी, कागज की नाव चलाता था।।

 

इमली, आंवला, आम, करौंदे, बागों से खूब चुराता था,
पूरे गांव में लेकर डंडा, मैं दिनभर टायर दौड़ाता था।
एक रूपया दो करने को, पटरी पर रख आता था,
बहुत मज़ा तब आता था, बहुत मज़ा तब आता था।।

 

बांध गले में उसके घंटी, बछड़े को दौड़ाता था,
गेट पे अपने झूल-झूलकर, आसमान में जाता था।
एक रूपए में मैं पूरी, पूरी बत्तीस टाफी लाता था,
घर में हर एक नई चीज पर, मैं अधिकार जमाता था।।

 

लोट-पोट मैं पापा से, हर जिद पूरी करवाता था।
बहुत मज़ा तब आता था, बहुत मज़ा तब आता था।।

अभिजित त्रिपाठी
 अमेठी

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