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ना समझी में कहीं ना कहीं, वो खुद पर ही प्रश्न लगाता है

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जिसको जैसा सही लगा,
उसने वो ढ़ंग है अपनाया।
कोई लिखा है हजार पंक्तियाँ,
कोई चार पंक्ति ना लिख पाया॥ 


कभी कभी इस दुनियाँ में इंसा,
कुछ ऐसा भी कह जाता है।
ना समझी में कहीं ना कहीं,
वो खुद पर ही प्रश्न लगाता है॥ 


यूँ ही तुम्हारे कुछ उपनामों से,
मेरी छवि ना कभी धूमिल होगी।
लेकिन इतना तो है ही भान मुझे,
खुद से ही खुद की पहचान मुझे॥ 


कि जिस क्षण सोचोगे तुम इस बारे में,
तुम्हें उस क्षण खुद में ही ग्लानि होगी। 
नहीं हूँ कहता मैं कुछ भी,
बस मुस्काकर रह जाता हूँ॥ 


जो करते हैं सदा ही नासमझी, 
मैं हँसकर के उन्हें चिढ़ाता हूँ। 
गर थोड़ा सा भी दिमाग जो होता,
तो दिमाग दार बन जाता मैं॥ 


बनकर तुम सा ही ब्रिलियंट,
दूजो का उपहास उड़ाता मैं।
तुम लिखने को समझे यदि मजनू गीरी, 
तो थोड़ा सा लिखकर दिखला दो॥ 


अल्फाजों की समझ है कितनी,
तुम उससे ही परिचित करवा दो। 
ज्यादा कुछ तो नहीं है दिल में,
लेकिन इतना जरूर बताता हूँ॥ 


है मेरा लेखन कार्य ही वो, 
जो मुझको ऊपर रखता है।
जब भी करता है कोई उपहास मेरा,
ये उसको सटीक सा उत्तर देता है॥


अनूप पाण्डेय 
नई दिल्ली

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