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मर चुकी हूं मै अब डर नहीं लगता आर पार में

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नाजाने कितने ख्वाब पिरोए मैने तुम्हारे प्यार में,
चहरे पर सिलवटें गिरने लगी तुम्हारे इंतजार में।

 

चहरे की रंगत शुष्क हो गई जैसे सूखा रेगिस्तान कोई,
कब से तड़प रही में तुम बिन इस सावन की फुहार में।

 

कहा छोड़ कर चले गए मुझ को ए-सनम,
तड़पती हूं मै जैसे सुनी पड़ी तलवार म्यान में।

 

रूक गया मानो घड़ी का काटा मुझ पर आकर,
तुम बिन ठहरी हो जैसे कश्ती मेरी बीच मजदार में।

 

झूठे दिल के आशियाने कभी आबाद नहीं होते,
ना जाने कितने लूटे इस फरेबी संसार में।

 

"मनदीप"तुम कब आओगे मुझे इतना तो बता दो,
मर चुकी हूं मै अब डर नहीं लगता आर पार में।

 

मनदीप साई

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