Home Blogs सब समझते हैं शतरंज की चाल तुम्हारी, चुप हैं देखते हैं कि मात दोगे कबतलक

सब समझते हैं शतरंज की चाल तुम्हारी, चुप हैं देखते हैं कि मात दोगे कबतलक

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सियासत की राह चलोगे कबतलक,
अपनों का खूं पियोगे कबतलक।

 

हां नही बस तुम यहीं कर रहे हो,
मुखौटे लगा चलोगे कबतलक।

 

लायक बन डंसते हो बनाने वाले को,
बन आस्तीन का सांप रहोगे कबतलक।

 

हर इमारत की नींव कर दी खोखली है,
कमीशन पर हमारे पलोगे कबतलक।

 

भूल जाते हो गद्दी पर बैठकर क्यों,
दंगे से सत्ता पर काबिज रहोगे कबतलक।

 

सब समझते हैं शतरंज की चाल तुम्हारी,
चुप हैं देखते हैं कि मात दोगे कबतलक।

 

समझते हो अपने को समझदार भी बहुत,
जम्हूरियत को मूर्ख बनाओगे कबतलक।

 

मन भर गया है तुम्हारे हर करतूत से,
देखो जुल्म जारी रख सकोगे कबतलक।

 

गद्दी पर शक्ल बदली चरित्र सबका एक सा,
देखते हैं ये चलन तुम बदलोगे कबतलक।

 

डॉ॰ गौरव त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफेसर
मीरजापुर 

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