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वो संतो का जमाना ना जाने आज कहां खो गया

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जानवर और इंसान में अब कहां फर्क रह गया,
सीता जैसी नारी है नर में राम ना जाने कहां खो गया।

 

लुटते हैं आबरू अपनी ही बहन बेटियों की,
अब बहन का भाई बेटी का पिता ना जाने कहां खो गया।

 

महफूज क्यों नहीं आज अपने घर की लक्ष्मी,
वो संतो का जमाना ना जाने आज कहां खो गया।

 

तुम सब तरस जाओगे इन्सान में इन्सानियत देखने को,
ना जाने पार्वती का सन्यासी शिव अब कहां खो गया।

 

जन्म लेने को तरसते हैं लोग जिस देश में,
अब ना जाने "मनदीप" वो हिन्द कहां खो गया।

 

मनदीप साई
कुरुक्षेत्र

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