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मात, पिता, गुरु का... नहीं करो कभी अपमान

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गुरु चरणों में देख लो, सिमटा है संसार।
भवसागर से एक बस, गुरु ही खेवनहार।।

 

गुरु के ही आशीष से, बनते सभी महान।
मात, पिता, गुरु का नहीं, करो कभी अपमान।।

 

गुरुवर की जब हो कृपा, मिले रंक को राज।
जिसपर क्रोधित हों गुरू, छिन जाते हैं ताज।।

 

तपा-तपाकर शिष्य को, गुरु बनाते स्वर्ण।
गुरु के आयुध ज्ञान से, चमके अर्जुन कर्ण।।

 

ज्ञान-नेत्र जो खोलकर, संशय हरें अपार।
ऐसे गुरु को हम करें, नमन कोटि शत् बार।।


अभिजित त्रिपाठी 'अभि'
पूरेप्रेम, अमेठी

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