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कविता: सम्मान कभी गिरने न दो

बात चाहें जो भी हो जग में,
सम्मान कभी भी गिरने न दो।
अड़े रहो तुम संघर्षों के आगे,
हिम्मत को कभी डिगने न दो।।

 

कोई नही पाता एक पल में,
अपनी मन चाही मंजिल को।
लगे रहो तुम सदा प्रयत्नों में,
साहस को कभी डिगने न दो।। 

 

आज नहीं तो कल को यारा, 
तुम मंजिल को पा ही जाओगे।
लेकिन मंजिल को पाते ही तुम, 
स्वंय खुद ही में बदलाव न दो।।

 

जुड़ा जो होता जमीं से इंसा,
वो एक न एक दिन ऊपर जाता है।
देख के उसके बुलंद हौसले,
आसमां भी झट से झुक जाता है।। 

 

सब देते हैं उसको विजय बधाई, 
वो जग में एक सीख नई धर जाता है। 
माना हमनें कि इस दुनियां में,
कुछ तुम पर ही प्रश्न उठाएंगे।।

 

लेकिन उन प्रश्नों का देकर उत्तर,
तुम एक इतिहास नया ही गढ़ देना।
जो रहते हैं सदा अंधे नफरत में,
तुम उनको भी प्रेम सदा ही देना।।

 

कवि-अनूप पाण्डेय 
नई दिल्ली

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