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सुना गान एक मधुकर मैनें, फटे बाँस की मधुराई से

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गहन पहाड़ी की खाई से,
दूर तलक की तन्हाई से।
चंचल सरिता की कोमल,
कल-कल छल-छल की शहनाई से।।
चिड़ियों की चूँ-चैं में लिपटी,
मधुर पवन की सहलाई से।
सुना गान एक मधुकर मैनें,
कोलाहल की गहराई से।।

 

बाग-कूप की गहराई से,
हरित तृणों की लहराई से।
मन्दिर की घन्टी की टन-टन, 
में लिपटी उस खनकाई से।।
उसमें बैठी सुन्दर-सात्विक,
प्रभु प्रतिमा की प्रभुताई से।
सुना गान एक मधुकर मैनें,
फटे बाँस की मधुराई से।।

 

बूढ़ी अम्मा की बहराई से,
लोगों की आवा-जाई से।
ताल-तलैया में डूबी,
काली भैसों की नहलाई से।।
गाँव-गाँव में फैल उठी,
उस शरद ऋतु की अलसाई से।
सुना गान एक मधुकर मैनें,
फेरीवालों की कहलाई से।।

 

पीपल के पूजन फलदायी से,
नास्तिक जन की कड़वाई से।
अविश्वास के विश्वासीजन,
के पूजन में ढ़िलाई से।।
भक्ति में खोए भक्तों के,
अश्रुजल की छलकाई से।
सुना गान एक मधुकर मैनें,
अपने पापों के भरपाई से।।

 

विस्फोटक ध्वनि की दहलाई से,
पृथ्वि की नकली गोलाई से।
हरे-भरे क्षेत्रों में अनु,
रंगीले ध्वज की फहराई से।
सुना गान एक मधुकर मैनें,
छिड़े युद्ध की भरपाई से।

 

सृष्टि तिवारी
गंगौली, अमेठी

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