Home Website सीतापुर:  छप्पर में पढ़ रहे बच्चे, अधिकारी बोले- अपने पैसों से तो नहीं बनवा सकते बिल्डिंग

सीतापुर:  छप्पर में पढ़ रहे बच्चे, अधिकारी बोले- अपने पैसों से तो नहीं बनवा सकते बिल्डिंग

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सीतापुर
उत्तर प्रदेश की सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए नए-नए कदम उठा रही है ताकि स्कूलों में पढ़ने में किसी भी प्रकार की समस्या न हो। सरकार कायाकल्प योजना के अंतर्गत स्कूलों की सूरत बदलने की कोशिश में लगी हुई है। इसके बावजूद कई स्कूलों की बहुत सी दिक्कते सामने आ रही हैं। जिसके चलते बच्चों को परेशान होना पड़ रहा है। ताजा मामला यूपी के सीतापुर जिले का है। यहां का एक विद्यालय तीन साल पहले नदी की कटान में धराशायी हो गया। तब से स्थिति यह है कि बच्चे छप्पर के नीचे चटाई पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। इस बात पर बीईओ का कहना है कि विभाग जब पैसा भेजेगा तब ही बनवाएंगे कोई अपने पास से तो नहीं बनवाएंगे।

 

सीतापुर जिले में विकास खंड बेहटा के प्राथमिक विद्यालय सेतुही का भवन तीन वर्ष पहले शारदा नदी की कटान में धराशायी हो गया। इसके बाद कुछ समय तक विद्यालय को नदी के दूसरे छोर पर संचालित किया गया। फिर वहां के शिक्षक कुछ समय के बाद नदी के दूसरे किनारे पर छप्पर डाल कर छात्रों को चटाई पर बैठा कर पढ़ाने लगे। तीन साल हो गए विद्यालय को नदी में समाए हुए और आज तक यह प्राथमिक विद्यालय उसी छप्पर के नीचे चल रहा है। ग्रामीणों के अनुसार विद्यालय में कभी-कभार ही सभी शिक्षक नजर आते हैं, नहीं तो एक ही शिक्षक विद्यालय में दिखता है। इन सब हालातों के कारण छात्रों की विद्यालय में उपस्थिति काफी कम हो गई है। विद्यालय में 113 छात्र पंजीकृत हैं और पांच शिक्षकों की तैनाती है लेकिन कभी भी सभी शिक्षक नहीं आते हैं। जिसके चलते छात्रों की संख्या घटती चली गई। 

 

बच्चों के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ के चलते जब एजुकेशन बीट्स ने इस क्षेत्र के बीइओ से बात की तो उन्होंने बताया कि 2014-15 में विद्यालय का भवन कटान के कारण बह गया था लेकिन आज तक विभाग द्वारा कोई भी पुनः भवन निर्माण के लिए नहीं आया है। हम लोग ग्राम प्रधान के साथ मिल कर चबूतरा बनवा कर टीन शेड डलवाने का प्रयास कर रहे हैं जिससे बच्चे पढ़ सकें लेकिन पैसा न होने के कारण प्रधान उसको नहीं करवा पा रहे हैं। बच्चों को छप्पर के नीचे पढ़ाने वाली बात पूछने पर बीईओ का कहना है कि विभाग पैसा नहीं भेज रहा है तो क्या बच्चों को ऐसे ही छोड़ दें, न पढ़ाएं। यह एक नीतिगत मामला है विभाग जब पैसा भेजेगा तब ही बनवाएंगे, कोई अपने पास से तो नहीं बनवाएगा।

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