Home News दीक्षांत के जश्न के बीच लविवि के छात्रों का गवर्नर को ज्ञापन, प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप

दीक्षांत के जश्न के बीच लविवि के छात्रों का गवर्नर को ज्ञापन, प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप

लखनऊ
एक ओर जहां मंगलवार को लखनऊ विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह का जश्न चल रहा था वहीं कुछ छात्रनेता ऐसे भी थे जिनकी अनुवाई में छात्र कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल को विश्वविद्यालय की समस्याओं से अवगत कराना चाहते थे। इन छात्रों ने मंगलवार को दीक्षांत के दौरान कुलाधिपति के नाम से एक ज्ञापन जिला प्रशासन के अधिकारियों को सौंपा। ज्ञापन में छात्रसंघ की बहाली से लेकर, पीने के पानी, साफ-सुथरे वॉशरूम, छात्रावास से संबंधित मूलभूत सुविधाओं, बढ़ी हुई फीस की वापसी जैसी मांगों को रखा गया है।

 

ज्ञापन में छात्रों ने कहा है कि विश्वविद्यालय महंगी फीस देने के बावजूद छात्र-छात्राओं को परिसर में मूलभूत सुविधाएं भी नहीं उपलब्ध करा पा रहा है। छात्रों का दावा है कि विश्वविद्यालय में व्याप्त समस्याओं के खिलाफ यदि कोई छात्र या छात्रा आवाज उठाता है तो उसे निलंबित/निष्कासित कर दिया जाता है।

 

ज्ञापन में बताया लविवि का गौरवशाली इतिहास, प्रशासन पर लगाए बड़े आरोप
कुलाधिपति को सौंपे गए ज्ञापन में छात्रों ने कहा है कि लखनऊ विश्वविद्यालय से आचार्य नरेंद्रदेव और डॉ० शंकरदयाल शर्मा की ऐतिहासिक विरासत को समेटे देश-दुनिया के अमूमन सभी क्षेत्रों में विलक्षण और प्रभावशाली लोग निकले हैं। जिनकी महान स्मृतियों से विश्वविद्यालय का कोना-कोना जुड़ा है। यहां के छात्रों ने अपने क्रांतिकारी लहजे से 1937 में ही अंग्रेजों की खिलाफत करते हुए विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन पर तिरंगा झंडा फहराने, 1973 में पीएसी विद्रोह का नेतृत्व समेत तमाम आन्दोलनों को अंजाम देने का काम किया है। यह धारा छात्र राजनीति, साहित्य, विज्ञान, कानून, प्रबंधन एवं रंगकर्मियों सहित समाज की विभिन्न विधाओं में धीरे-धीरे मजबूत होती गई। लेकिन बीते वर्षों में इस महान परंपरा को अनेक मिथ्याप्रचार से संदिग्ध करने में विश्वविद्यालय प्रशासन निरंतर संलिप्त है।

 

कुलपति एसपी सिंह के फैसलों को बताया तानाशाही
ज्ञापन में कहा गया है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति की  निष्पक्षता और कैंपस के प्रति जिम्मेदारी पूरे कार्यकाल के दौरान कभी नहीं दिखी। कुलपति अपने तानाशाही फैसलों के कारण कैम्पस में भरोसा खो चुके हैं। विश्वविद्यालय के छात्र वर्तमान कुलपति के कार्यकाल को अब तक के विश्वविद्यालय के इतिहास में सबसे शर्मनाक और विध्वंसकारी मानते हैं। छात्रों ने कहा कि वे सभी लखनऊ विश्वविद्यालय की गरिमा, छात्रसंघ सहित छात्रहित से जुड़े सभी मुद्दों की लड़ाई लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

ज्ञापन में की ये मांगें
1- लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र संघ को बहाल करके परिसर में लोकतंत्र की बहाली की जाए।
2- विश्वविद्यालय में लगातार बढ़ाई जा रही हर प्रकार की फीस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।
3- विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं की बहाली की जाए एवं गलत तरीके से हुए फर्जी निलंबन और निष्कासन को तत्काल प्रभाव से वापस किया जाए।
4- विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा परिसर के आवासीय छात्रों को तत्काल प्रभाव से कॉशन मनी उन्हें प्रदान की जाए।
5- विश्वविद्यालय में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जाए और उसकी उच्चस्तरीय जांच कराकर दोषियों पर तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की जाए।

 

गवर्नर से मिलने से रोके गए छात्रनेता
इससे पहले दीक्षांत में राज्यपाल को अपनी मांगों का ज्ञापन देने की तैयारी कर रहे समाजवादी छात्र सभा के पदाधिकारियों को पुलिस ने आईटी चौराहे पर रोक लिया। इसके बाद छात्र नेता एकजुट होकर विश्वविद्यालय के गेट नंबर एक पर पहुंच गए। यहां जिला प्रशासन के अधिकारियों को छात्र नेताओं ने ज्ञापन दिया। ज्ञापन देने वालों में मुख्य रूप से महेंद्र यादव, गौरव पांडेय, लालू कनौजिया, माधुर्य सिंह, अवनीश यादव, प्रशांत समेत अन्य छात्र नेता शामिल रहे।

 

एडिटर की बात
यह तो सच है छात्रसंघ के नाम पर कई छात्रनेता गुंडई और अराजकता फैलाते हैं, लेकिन इसके साथ एक सच और भी है कि छात्रसंघ ना होने से छात्रों की आवाज को, उनके मुद्दों को प्रशासन तक पहुंचाने का कोई जरिया नहीं रह जाता। एक सामान्य छात्र अगर किसी समस्या को फेस कर रहा है तो ना ही वह विश्वविद्यालय के उच्च अधिकारियों से शिकायत की हिम्मत जुटा पाएगा और ना ही विश्वविद्यालय या महाविद्यालय प्रशासन उन समस्याओं को गंभीरता से लेगा। कोई इस फैक्ट से कितना भी इनकार करे, लेकिन अब फैक्ट तो फैक्ट ही है। छात्रसंघ आम छात्रों की समस्याओं को सीधे प्रशासन के सामने रख सकता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा होने के नाते, उनका समाधान कराने में भी सक्षम है।

 

अब बात करते हैं उन लोगों की जो कहते हैं कि छात्रसंघ से अराजकता फैलती है। तो सरजी, अराजकता तो सड़क पर शराब पीने वाले भी सड़क पर फैलाते हैं, वे अराजकता ना फैला पाएं, इसके लिए नियम और कानून बनाए हैं ना? शराब तो बंद नहीं कर दी ना? तो जब लिंगदोह की सिफारिशें लागू हैं तो कराइए छात्रसंघ, रोकिए अराजकता। पुलिस प्रशासन पर हमारी जेब से पैसा तो खर्च ही हो रहा है ना? वे रोकेंगे अराजकता। अब अराजकता फैलने के डर से छात्रों का ह तो नहीं मार सकते ना। 

 

सीधी सी बात है, एजुकेशन बीट्स छात्रसंघ चुनाव के मुद्दे पर स्पष्ट रूप से कहता है कि चुनाव होना चाहिए। छात्र हितों के साथ किसी भी कुतर्क को सहारा बनाकर खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। छात्रसंघ लोकतांत्रिक आवाज का एक प्राथमिक नमूना है, उसे रोकने का मतलब है कि आप भारतीय राजनीति की जड़ों में तेजाब डालकर संघर्ष करने की, नेतृत्व करने की प्रवत्ति को ही खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं।

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