Home News यूपी: प्रिंसिपल ने क्लास लेने को कहा तो शिक्षक ने लगाया जातिगत भेदभाव का आरोप!

यूपी: प्रिंसिपल ने क्लास लेने को कहा तो शिक्षक ने लगाया जातिगत भेदभाव का आरोप!

बांदा
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से एक हैरान करने वाला मामला आया है। बांदा के बिलगांव में स्थित राजकीय इंटर कॉलेज के एक शिक्षक ने वहां के प्रभारी प्रधानाचार्य पर आरोप लगाया है कि प्रभारी प्रधानाचार्य ने शिक्षक के साथ भेदभाव किया। मामला इसलिए भी उछला क्योंकि वह शिक्षक दलित समुदाय से आता है और प्रधानाचार्य सवर्ण। प्रधानाचार्य पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने कथित तौर पर पीड़ित शिक्षक को जातिगत भेदभाव के चलते अपमानित किया। कथित तौर पर पीड़ित शिक्षक ने यह भी आरोप लगाया कि वहां के प्रभारी प्रिंसिपल लगातार उन्हें अपमानित करते हैं और उनपर जातिगत टिप्पणियां करते हैं। बात इतनी सी ही नहीं है, शिक्षक का आरोप है कि प्रिंसिपल की प्रताड़ने के चक्कर में उसे हॉस्पिटल तक में एडमिट होना पड़ा।

 

मामला एजुकेशन बीट्स के संज्ञान में आया तो हमारी संपादकीय टीम भी हैरान थी कि आखिर आजादी के इतने सालों के बाद भी हमारे प्रधानाचार्य इस तरह के भेदभाव में फंसे हुए हैं। पहले तो हम इस मामले में कथित तौर पर पीड़ित शिक्षक के आरोप के आधार पर खबर प्रकाशित करना चाहते थे लेकिन बाद में हमारी संपादकीय टीम के सलाहकार उत्कर्ष बाजपेई की सलाह पर पत्रकारीय मूल्यों के हिसाब से हमने इन आरोपों की अपने स्तर पर जांच करने के बारे में सोचा। हमारी जांच में जो बिंदु सामने आए, वे वाकई हैरान करने वाले थे।

 

सबसे पहले तो हमने बिलगांव के राजकीय इंटर कॉलेज के प्रभारी प्रधानाचार्य के व्यवहार के बारे में पता किया। स्कूल के छात्रों से मिली जानकारी के मुताबिक यह कहा जा सकता है कि उनका मूल व्यवहार किसी के साथ जातीय विभेद रखने का तो नहीं हो सकता। स्कूल के छात्रों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि प्रिसिंपल का व्यवहार थोड़ा सा सख्त जरूर है लेकिन स्कूल के छात्रों की जाति को लेकर उन्होंने कभी कोई टिप्पणी नहीं की। इस चीज को लेकर हमने कॉलेज के कर्मचारियों सहित अन्य स्टाफ से बात की, लेकिन वहां से भी वही बताया गया जो छात्रों ने बताया था। इन सभी से जब हमने दोनों के बीच हुए मामले के बारे में पूछा तो जो बातें सामने आईं वे हैरान करने वाली थीं।

 

छात्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार यानी 14 अक्टूबर को अंग्रेजी विषय के दलित शिक्षक भूपेंद्र कुमार दूसरे पीरियड में 11वीं कक्षा के कुछ छात्रों के साथ ग्राउंड में बैठे थे। थोड़ी देर में तीसरे पीरियड की बेल बजी लेकिन भूपेंद्र ने क्लास नहीं छोड़ी और छात्रों से फीस इत्यादि को लेकर बात करते रहे। कुछ देर के बाद प्रिंसिपल ऑफिस का कर्मचारी वहां आया और उन्हें प्रिंसिपल ऑफिस में ले गया। वह वहां से वापस आए तो एंबुलेस को फोन किया और तबियत बिगड़ने की बात कहने लगे।

 

इस बारे में प्रिंसिपल आशीर्वाद सिंह ने बताया कि 11वीं कक्षा में तीसरा पीरियड वह खुद लेते हैं। सोमवार को जब वह क्लास में गए तो वहां बच्चे नहीं थे। बाद में जानकारी मिली कि बच्चों के साथ भूपेन्द्र ग्राउंड में बैठे हैं, तो वह वापस जाकर अपने ऑफिस में गए। उनके ऑफिस के बगल में ही 10वीं क्लास है। वहां से लगातार शोर आ रहा था तो उन्होंने कर्मचारी से भूपेन्द्र को बुलवाया और कहा कि आप का 11वीं में पीरियड खत्म हो गया है, आप 10वीं की क्लास लीजिए और मुझे 11वीं की क्लास लेने दीजिए, जिससे कि कॉलेज का अनुशासन बना रहे। इस पर भूपेंद्र ने कहा कि वह बच्चों की फीस जमा कर रहे थे, और अब नहीं करेंगे। (भूपेंद्र 11वीं के क्लास टीचर भी हैं) प्रिंसिपल आर्शीवाद के मुताबिक, इसके बाद वह ऑफिस से बाहर चले गए। आगे क्या और कैसे हुआ, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। अगर आपके मन में अभी भी कोई शंका है कि कथित तौर पर पीड़ित शिक्षक पूरी तरह से सच बोल रहा है, तो एजुकेशन बीट्स उसे दूर कर दे रहा है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि भूपेंद्र और आर्शीवाद पुराने दोस्त हैं। करीब सात सालों से इनकी दोस्ती है। सूत्रों की मानें तो स्कूल में भूपेन्द्र के स्वास्थ्य को लेकर प्रिंसिपल आशीर्वाद सिंह की काफी सहूलियतें भी दी जाती थीं। हालांकि प्रिंसिपल आशीर्वाद का कहना है कि दो-चार बार ही ऐसा हुआ जब वह अपनी क्लास को छोड़कर कॉलेज से जल्दी चले गए या स्वास्थ्य के लिए छुट्टी ली। लेकिन हमारे सूत्रों से पता लगा है कि दोनों की दोस्ती को लेकर स्कूल में काफी चर्चा थी।

 

अब एजुकेशन बीट्स कुछ सवाल उठा रहा है, इन सवालों के जवाब एक जिम्मेदार नागरिक, छात्र या अभिभावक होने के नाते आपको सोचने चाहिए:
-अगर वाकई प्रिंसिपल आशीर्वाद सिंह जातिगत भेदभाव रखने वाले व्यक्ति थे तो क्या पहले उन्हें भूपेन्द्र की जाति के बारे में पता नहीं था? 
-अगर आशीर्वाद सिंह को उनकी जाति के बारे में पता नहीं था, और उऩके मन में जातिगत विभेद भी था तो फिर आखिर क्यों सात सालों तक उन्होंने इस दोस्ती को परवान चढ़ने दिया?
-अगर सात सालों में भूपेन्द्र को यह लगता था कि आर्शीवाद के मन में जातिगत विभेद जैसी चीजें हैं तो वह ट्रांसपर कराकर उसी कॉलेज में क्यों पहुंचे, जहां आशीर्वाद प्रिंसिपल थे?
-अगर आशीर्वाद के मन में जातिगत विभेद है तो वह छात्रों, अन्य शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ जाहिर क्यों नहीं होता?
-आरोप सच हैं या झूठ, आरोपी तो प्रिंसिपल आशीर्वाद सिंह ही हैं। अगर आरोप झूठे हुए तो विभाग क्या भूपेन्द्र पर कड़ी कार्रवाई करने की हिम्मत जुटा पाएगा?

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